सोमवार, 24 मई 2010

समानता का पक्ष

Monday, February 05, 2007, 2:45:10 पम

आज घर पर एक मित्र आईं हुई थीं। वे एक एनजीओ में काम करती है। वैसे वो पेशे से शिक्षिका है लेकिन कुछ नया करने की चाहत उसे एनजीओ क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित करती रही थी। वस्तुत: उसने इस क्षेत्र को एक नए दायरे के रूप में काम के लिए चुना। वर्तमान में जिस एनजीओ में वह काम करती है वहाँ उसे आसानी से काम भी मिल गया क्योंकि यह संस्था भी नवाचारी काम और लोगों को जगह देने की पक्षधर है, भलेही वह नवाचार जमीनी हो। करीब दो साल के अनुभवों के बाद मेरी ये मित्र काफी निराश है। जिस त्याग के साथ उसने इस क्षेत्र को चुना था उसका पश्चाताप भी अब उसे होता है। उसकी परेशानी के दो प्रमुख कारण हैं। ये दोनों ही कारण स्वयंसेवी संस्थाओं और अन्य निजी क्षेत्रों में पनप रहे एक अघोषित भेदभाव का खुलासा करते हैं। एक इसमें वेतन का दायरा, और दूसरा काम का मूल्याँकन है।
गौरतलब है कि एक ऊँचे और एक नीचे ओहदे पर काम कर रहे व्यक्ति के बीच में वेतन का अंतर मेरी इस मित्र को हर समय परेशान करते रहता है। उसका मानना है कि जब स्वयंसेवी क्षेत्र समानता की बात करता है तो यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं होना चाहिए। इस वेतन के अंतर पर तो वह फिर भी समझौता करने के लिए तैयार हो जाती है लेकिन जब दूसरे मुद्दे पर बात छिड़ती है तो वह काफी आक्रोश से भर जाती है। दूसरा मुद्दा काम के मूल्याँकन का है। यदि वेतन वृध्दि की बात सामने आए तो संस्था के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों का मानना होता है कि मूल्याँकन करके वेतन बढ़ाया जाना चाहिए। वेतन ही नहीं बल्कि किसी व्यक्ति के काम को आगे बढ़ाने के लिए भी मूल्याँकन को आधार मानने का पक्ष आमतौर पर लिया जाता है। स्वाभाविक है कि जब आप मूल्याँकन की बात कर रहे होते हैं तो समानता की बातें अपरोक्ष रूप से असमानता के रूप में सामने आती हैं। और चूंकि आपकी बातें सबको समान दृष्टि से देखने का पक्ष लेती हैं तो विरोध की कम ही गुंजाइश बचती है। जबकि असलियत इससे फर्क किस्म की होती है और वास्तव में यदि इस समानता के पक्ष का विश्लेषण किया जाए तो यह जाति और वर्ग के आधार पर लोगों को बांटने का यह एक अच्छा हथियार भी हो सकता है। किसी तरह से यदि कोई निचले तबके का व्यक्ति संस्था में काम के लिए भी गया है तो इस मूल्यांकन के बहाने उसे आसानी से बाहर भी किया जा सकता है।
यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें बाजी निर्णायक ओहदे पर बैठे लोगों के हाथ में ही होती है। एक तो प्रमुख बात यह है कि जब मूल्यांकन करते हैं तो निश्चित ही यह मूल्यांकन उस व्यक्ति के काम का होगा जो संस्था में उसे दिए गए हैं। पर मसला केवल उसके काम का नहीं है। मेरी इस मित्र का मानना है कि आप किसी व्यक्ति के केवल काम का मूल्यांकन कैसे कर सकते हैं जबकि उसके काम को समाज के अन्य फेक्टर भी प्रभावित करते हैं। मसलन उसकी जाति, वर्ग, लिंग और जिससे वह निकलकर आया है या जहां रहता है वह परिवेश आदि। क्या एक दलित, आदिवासी या पिछड़े वर्ग का व्यक्ति समाज के दूसरे लोगों से समान रूप से प्रतियोगिता में ठहर सकता है। शायद नहीं! क्योंकि यदि ऐसा होता तो फिर आरक्षण जैसी चीज़ों की जरूरत ही नहीं होती। व्यक्ति जो भी काम करता है वह केवल उस अकेले पर निर्भर नहीं है उसे आसपास का वातावरण, समाज के अन्य सभी पहलु प्रभावित करते हैं। जब आप तुलनात्मक रूप से किसी उच्च वर्ग के व्यक्ति के साथ उसे खड़ा करेंगे तो हो सकता है कि वह इस मूल्याँकन में असफल हो जाएगा। और ऐसी स्थिति में आप यह कहकर कि आप तो समान व्यवहार करते है बरी हो जाएँगे। इस बात से नहीं नकारा जा सकता है कि काम का मूल्यांकन नहीं होना चाहिए किन्तु असल में काम की जगह देने से लेकर लोगों के प्रशिक्षण और प्रोत्साहन होना भी उतना ही जरूरी होता है। केवल मूल्यांकन से काम नहीं चल सकता।
यह पूरा मुद्दा दिखने में भले ही सरल हो लेकिन वास्तव में इतना सरल नहीं है। कई ऐसी बातें है जो इस मुद्दे पर अपना असर छोड़ती हैं। इसलिए जब आरक्षण की बात सामने आती है तो ऐसे लोग यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि वे तो समानता पर विश्वास करते हैं। यह बात केवल किसी एक संस्था की नहीं है बल्कि यह पूरे समाज के दृश्य को सामने रखती है। तमाम तरह के भाषणों में आरक्षण का पक्ष लेने वाले ये लोग अपनी व्यवहारिक जिन्दगी में जब समानता की बात करते हैं तो इसका सीधा सादा पक्ष सामने आता है कि आप घोर असमानता के पक्षधर हैं। ऐसी स्थिति में कम से कम सरकारी क्षेत्र, जो भलेही कितना भी निकम्मा माना जाता हो, मजबूरी में नौकरी और काम के लिहाज से जाति आधारित समानता अपनाने के लिए प्रतिबध्द होता है। क्या स्वयंसेवी, कार्पोरेट या अन्य निजी क्षेत्र में तथाकथित समानता के पीछे पनप रही इस असमानता को दूर करने के लिए कोई कारगर कदम उठाया जा सकेगा?

ई 7/70 अशोका सोसायटी
अरेरा कॉलोनी, भोपाल 462016 (म.प्र.)

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