शुक्रवार, 14 मई 2010

होमवर्क

Wednesday, September 13, 2006, 12:25:42 AM
मेरी चार साल की बेटी रितिका ने स्कूल जाना बन्द कर दिया है। करीब दो महिने वो मोहल्ले के ही एक स्कूल में पढ़ने गई। अब वह घर में ही अपनी मां से रोजाना पढ़ती है। और जहां तक मेरा कयास है, उसे लगभग उसकी उम्रानुसार जानकारी है। वह ढेर सारी किताबी बातों को अब समझने लगी है। मुद्दा रितिका के स्कूल जाने या नहीं जाने का नहीं है। जब उसे स्कूल का अर्थ समझ में आएगा तब वह स्कूल जाने लगेगी। लेकिन उसके स्कूल छोड़ने का कारण विचारणीय है।
असल में रितिका होमवर्क नहीं करना चाहती है। और उसकी टीचर का दबाव है कि वह अपना होमवर्क करे। इस बात की शिकायत उक्त शिक्षिका मुझसे भी कर चुकी हैं। मैंने रितिका से एक दिन कहा कि उसे अपनी टीचर की बात मानते हुए अपना होमवर्क करके स्कूल जाना चाहिए। उसने खुश होकर मेरा कहा माना। दूसरे दिन जब टीचर ने उसे अंग्रेजी की वर्णमाला लिखकर लाने को कहा तो उसने अपनी सारी कापी में कुछ चित्र बना ले गई। फिर क्या था इतना बड़ा जुर्म टीचर कैसे स्वीकार कर सकती थी। उसने रितिका को डांटने के बाद मुझसे फिर से शिकायत की कि रितिका ने उसके द्वारा दिए होमवर्क के स्थान पर चित्र बना दिए है। मैनें उसके चित्र देखे काफी अच्छे थे उसमें से एक-दो बच्चों की पत्रिका उड़ान और चकमक में भी छपे। लेकिन रितिका को होमवर्क का तरीका रास नहीं आया और उसने तय किया कि वह स्कूल नहीं जाएगी। अब वह दिनभर चित्र बनाती रहती है। और मानती है कि वह होमवर्क कर रही है।
यह हाल होशंगाबाद के केवल मेरे मोहल्ले के इस स्कूल का ही नहीं है। बल्कि अमूमन हर स्कूल में होमवर्क एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है। तीन साल के बच्चे के बालमन को होमवर्क के बोझ में डालकर जाने कौन सी प्रगतिषील पीढ़ी स्कूलों के जरिए तैयार की जा रही है। शिक्षकों से यदि बात करो तो कहते है कि हम होमवर्क नहीं दें तो फिर पालक नाराज होते हैं। दरअसल हर व्यक्ति मानता है कि होमवर्क ही असली पढ़ाई है। इन दिनों पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर तमाम तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि बस्ते का बोझ कम किया जाना चाहिए। बच्चों पर अनावष्यक दबाव भी कम करने के बारे में सिफारिषें की जा रही हैं। लेकिन उसके बरख्त आज भी तथाकथित कस्बाई और शायद शहरी संस्कृति होमवर्क की संस्कृति बनते जा रही है। अब तो गाँव में भी यह संस्कृति अपनी जगह बनाने लगी है।
हिन्दी के कवि और शिक्षा में पिछले कई सालों से काम कर रहे श्री श्यामबहादुर नम्र की एक कविता होमवर्क मध्यप्रदेश में खूब चर्चा में रहती है। इस कविता के कई संस्थाओं ने तो पोस्टर भी छापे हैं। यह कविता स्कूल जाने वाली दो लड़कियों के रोजमर्या के घटनाक्रम के बहाने होमवर्क ही नहीं पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है। कविता कहती है कि एक बच्ची स्कूल जाती है। बकरी चराती है और लकड़ियाँ बटोरकर लाती है। फिर मां के साथ खाना पकाती है। एक बच्ची किताब लादे स्कूल जाती है शाम को थकी मांदी घर आती है। वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है। लेकिन लकड़ी से चूल्हा जलेगा यह लकड़ी लाने वाली लड़की यह जानती है लेकिन किताबी ज्ञान कब काम आएगा इसे जाने वगैर, स्कूल जाने वाली बच्ची बिना समझे पढ़ जाती है। होमवर्क और ग्रहकार्य के इस भेदभाव और शिक्षा को व्यवहारिक बनाने की बात नम्र जी ने इस कविता में कही है। कभी आपको कविता मिले तो ज़रूर पढ़ना। हाँ मैं भी आपको उक्त कविता उपलब्ध करा सकता हूँ।
गौरतलब है कि सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था इस कविता से उलटे ही चल रही है। रटंत पध्दति से पढ़ाई की यह प्रक्रिया बच्चों के सामने जिन्दगी की कोई तस्वीर पेश नहीं करती है और अंतत: पढ़ाई की औपचारिकता पूरी होने के बाद बेरोजगारों की जमात में नौजवानों को खड़ा होना पड़ता है। मध्यप्रदेश में तो शिक्षा में काम कर रही एकलव्य और भारत विज्ञान समिति जैसी संस्थाएँ लगातार शिक्षा में आमूल चूल बदलाव की कोशिश में लगीं हैं। ''मैने सुना भूल गया, मैनें देखा याद रहा और मैनें करके देखा समझ गया'' के सिध्दान्त पर एकलव्य का विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम मध्यप्रदेश के एक हजार स्कूलों में तीस साल तक चला। और अंतत: तथाकथित राजनीति ने अपनी ताकत दिखाते हुए एक झटके में इस कार्यक्रम का सफाया कर दिया। क्योंकि शायद इस पध्दति में किताबी होमवर्क नहीं था। यह किताब आसपास के परिवेश से जोड़ने की बात करती थी। जो शायद किसी को भी स्वीकार्य नहीं था। कब हम होमवर्क की संस्कृति से उपर उठकर शिक्षा के व्यवहारिक पक्ष को समझ पाएंगें यह सवाल अनुत्तरित ही है!
नर्मदा कॉलोनी, ग्वालटोली होशंगाबाद

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